महाभारत कथा – सम्पूर्ण श्रीमद भगवतगीता | Complete Shrimad Bhagavad Gita in Hindi

महाभारत कथा – सम्पूर्ण श्रीमद भगवतगीता | Complete Shrimad Bhagavad Gita in Hindi

महाभारत कथा - सम्पूर्ण श्रीमद भगवतगीता | Complete Shrimad Bhagavad Gita in Hindiजब पांडव और कौरव रणभूमि में पहुच गये थे तो अर्जुन का मन व्याकुल हो उठा और उसने श्रीकृष्ण को अपना रथ कुरुक्षेत्र रणभूमि के मध्य में लाने को कहा | रणभूमि के मध्य में आने के बाद अर्जुन ने कहा “हे श्रीकृष्ण  मै इस युद्ध में किन लोगो से युद्ध करने आया हु और किन लोगो के प्राण लेने आया हु , दोनों ही ओर तो एक ही वंश के लोग खड़े है , एक ही वृक्ष की डालिया , श्वेत वस्त्र में सामने जो खड़े है वो संसार के लिए गंगा पुत्र होंगे लेकिन मेरे लिए तो वो स्नेह की गंगा है , वो मेरे पितामह है केशव , उनके पास में ही आचार्य द्रोण है  जिन्होंने अपने ज्ञान सागर से मेरी आत्मा को नहला दिया और इस शिष्य की झोली में सारा ज्ञान उड़ेल दिया , उन्होंने जितना मुझे दिया है , उतना तो उन्होंने अपने पुत्र अश्वत्थामा को भी नही दिया , मै इनसे युद्ध करने आया हु और इनके प्राण लेने आया हु , ये सोचकर ही मै घबरा रहा हु मेरा गांडीव मेरे हाथो से सरक रहा है मै इन पर बाण क्या चलाऊंगा जिनके सत्कार के लिए मेरे रौंगटे तक खड़े हो जाते है , इन मूल्यों पर मुझे राज नही चाहिए , इतना सब कुछ कहने पर भी आप कुछ बोल क्यों नही रहे हो केशव “|

श्रीकृष्ण ने कहा “इस समय विनाश के बादल चारो ओर से उमड़ रहे है और धर्म विजय और रक्षा के लिए तुम्हारी आस लिए बैठा है , इस संकट की घड़ी में इन कायरता के हीन भावो को हृदय में आने कैसे दिया , धर्म और अधर्म के इस संगर्ष की इस निर्णायक घड़ी में नपुंसक ना बनो पार्थ , हे धनंजय तुम्हारा ये भाव अनार्य है , ये तुम्हे स्वर्ग और कीर्ति से गिरा देंगे और तुम स्वयं अपने तिरस्कार का कारण बन कर रह जाओगे इसलिए हे पार्थ , हृदय की इस दुर्बलता को त्यागो और युद्ध के लिए खड़े हो जाओ  ”

अब अर्जुन बोला “मै अपने प्रिय पितामह , आचार्य द्रोण और गुरु कृपाचार्य के वध के लिए कैसे खड़ा हो जाऊ जो मेरे लिए पूजनीय है , जिन गुरुओ ने मुझे विजय का मन्त्र सिखाया उन्हें पराजित करने के लिए कैसे खड़ा हो जाऊ , इन महापुरुषों पर हाथ उठाने से अच्छा इनके समक्ष भिक्षा के हाथ फैलाऊ , हे केशव मै तो इस युद्ध में ये भी समझ नही पा रहा हु कि विजय श्रेष्ठ है या पराजय , कौरव मेरे सामने युद्ध के लिए तैयार खड़े है और मै ये भी जनता हु कि उनका वध किये बिना जीना संभव नही है किन्तु उनका वध करने के पश्चात भी जीना सहज नही होगा , क्या वो मेरे भाई नही है आप ही बताइए ”

श्रीकुष्ण ने कहा “पार्थ तुम जानते हो कि ये युद्ध संबंधो और नातो की पहचान के लिए नही है , अपने कर्तव्य को पहचानो और तब निर्णय लो क्योंकि निर्णय तो तुम्ही को लेना पड़ेगा , यदि तुम ये चाहते को कि निर्णय मै लू और तुम इस युद्ध के उत्तरदायित्व से बच जाओ तो ऐसा संभव नही है क्योंकि ये युद्ध भी तुम्हारा है और इस युद्ध का परिणाम भी तुम्हारा ही होगा ”

अब अर्जुन बोला “मुझे कर्तव्य का मार्ग ठीक से दिखाई नही दे रहा इसलिए हे वासुदेव आप मेरे आत्मा के भी सारथी बन जाइए , मै जानता हु कि मै धर्म और अधर्म के बीच में खड़ा हु किन्तु मै ये निर्णय नही ले पा रहा हु कि धर्म किस ओर है और अधर्म किस ओर है , आप मेरा मार्गदर्शन कीजिये , इन्द्रियों को सुखा देने वाले इस शोक से बचने का मार्ग बता दीजिये , अपनी इस मानसिक अवस्था में मै युद्ध नही कर सकता हु ”

श्रीकुष्ण ने कहा “पार्थ , जो चले गये वो तो चले गये और ज्ञानी तो ना जाने वालो का शोक करता है और ना ही ना जाने वालो का , वे तो नाही विगत के लिए शोक करे ना ही अगत के लिए , तुम्हारी शैली तो ज्ञानियों जैसी है लेकिन तुम बाते मूर्खो जैसी करते हो , शोक करने से पहले ये तो देखो कि जिनके लिए शोक कर रहे हो  वे तो शोक के योग्य ही नही है , तुम इस सत्य को समझ लो कि मूल तत्व शरीर नही आत्मा है और मत्यु उसकी यात्रा का अंत नही है क्योंकि उसकी यात्रा तो अनंत है , मृत्यु तो केवल एक पडाव है , ऐसा समझो कि प्राणी तो पहले केवल बालक होता है फिर वो बालक युवा हो जाता है फिर वो युवा वृद्ध और फिर मृत्यु , किन्तु ये यात्रा तो शरीर की है लेकिन आत्मा तो इससे भी आगे जाती है वो एक शरीर को त्याग कर दूसरा शरीर धारण कर लेता है इसलिए जो यात्रा म्रत्यु पर समाप्त हो जाए वो तो केवल शरीर की है  ”

अब श्रीकृष्ण ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा “आत्मा की यात्रा तो अनंत है और उसकी यात्रा के एक बिंदु पर शरीर पीछे छुट जाता है और यात्री आगे निकल आता है और वो बिलकुल वैसे ही नया शरीर पहन लेता है जैसे हम पुराना वस्त्र उतारकर नया वस्त्र पहन लेते है ,  पर्थ विनाश तो आत्मा को छु ही नही सकता तो फिर कैसा शोक और किसके विनाश का शोक , क्या वस्त्र के विनाश का , लेकिन वस्त्र तो अमर नही होता वो तो त्यागे जाने के लिए ही होता है और आत्मा कभी नही मरती  ”

अब अर्जुन ने वासुदेव से कहा “आपका कहना उचित है परन्तु वो मेरे सामने युद्ध में खड़े हो वो सब युद्ध के पश्चात होंगे तो सही ”

वासुदेव ने कहा “ये होना या ना होना क्या होता हो ,क्योंकि वो समय तो कभी था ही नही ,जब मै नही था या तुम नही थे या ये सारे लोग नही थे और ना ही वो समय कभी होगा जब ,मै नही होऊंगा या तुम नही होगे या ये सारे लोग भी नही होंगे तो फिर तुम किस भ्रम में पड़ रहे हो कि वर्तमान जीवन ही सम्पूर्ण जीवन है लेकिन तुम ये जान लो कि वर्तमान जीवन सम्पूर्ण जीवन नही है हम थे भी , हम है भी और हम होंगे भी और अब ये रहे सुख-दुःख , इनका क्या है , ये तो ऋतुओ की भाँती आते जाते रहते है , जो सुख और दुःख दोनों को समान समझे और उनसे प्रभावित हुए बिना उन्हें झेल जाए वही मोक्ष का अधिकारी  है   ”

अब वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आगे समझाते हुए कहा “हे पार्थ ,मारने या मरने की आशंका से मुक्त हो जाओ क्योंकि म्रत्यु तो उसी की हो सकती है जिसका जन्म हुआ हो , आत्मा तो काल से भी परे है , जन्म तो केवल जीव का होता है आत्मा का नही , और यदि आत्मा जन्म ही नही लेती तो उसकी मृत्यु कैसे हो सकती है , आत्मा तो काल के तटो पर भी है और काल की धारा में भी , वो अजन्म है नित्य है , सनातन है ,अविकारी है अविनाशी है  इसलिए मारने या मरने के प्रश्न को लेकर चिंतित होना व्यर्थ है म्रत्यु तो केवल शरीर की होती है लेकिन आत्मा कभी नही मरती है क्योंकि शस्त्र उसे काट नही सकता , अग्नि उसे जला नही सकती , जल उसे भीगा नही सकता और वायु उसे सुखा नही सकती ”

अब अर्जुन को कहा “हे केशव वासुदेव श्रीकुष्ण , तो क्या मै केवल एक आत्मा को पितामह कहता हु , मेरे सामने खड़े वो एक वृद्ध योद्धा केवल एक आत्मा है क्या उनके शरीर ने , जिसे आप आत्मा कहते है , मुझे कई बार आशीर्वाद नही दिया था , वो सामने खड़े मेरे गुरु द्रोण केवल एक आत्मा है जिनसे मैंने धनुष विद्या सीखी थी , हे वासुदेव मै आत्मा के अविनाशी ,नित्य या सनातन होने के लिए मना नही करता हु लेकिन जिन शरीरो की मै मांग कर रहा हु वो तो मेरे भी कुछ लगते है , आप सही कहते है आत्मा तो जन्म नही लेती किन्तु लोग तो जन्म लेते है  ”

अब वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रश्न का जवाब दिया “हे पार्थ , लोग तो जन्म लेते है लेकिन जो जन्म लेगा उसकी म्रत्यु तो निश्चित है तो निश्चित का शोक क्यों कर रहे हो , जन्म लेने वाले को एक ना एक दिन तो मरना ही है और ये म्रत्यु भी अंत नही है क्योंकि मरने वाला फिर जन्म भी लेगा , ये तो एक अटल सत्य है और इस अटल सत्य को कोई टाल भी नही सकता है , गंगापुत्र भीष्म के पास तो इच्छाम्रत्यु का वरदान है किन्तु मृत्यु तो फिर भी अटल है तो जन्म ,मृत्यु और फिर जन्म की इस शृंखला में शोक का स्थान कहा है “|

अब वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आगे समझाते हुए कहा “जिन लोगो को तुम सामने खड़ा देख रहे हो , वो इस जन्म से पहले भी थे , लेकिन क्या थे ये तुम नही जानते हो , वो इस जन्म के उपरांत भी होगे लेकिन क्या होगे , ये भी तुम नही जानते हो , उनका अस्तित्व तो जन्म और मरण के दो बिन्दुओ के इधर या उधर नही है और अगर है भी सही तो वो अज्ञात है अर्थात इस जन्म से पूर्व भी वो तुम्हारे लिए नही थे और इस जन्म के उपरांत भी नही होंगे  इसलिए जिनके जीवन का अनिवार्य अंत ही मृत्यु हो और उनके इस जीवन के अनिवार्य अंत को ना तो तुम टाल सकते हो और ना ही बदल सकते हो तो फिर शोक किसका कर रहे हो पार्थ ”

उधर संजय जब श्रीकृष्ण और अर्जुन का वार्तालाप धृतराष्ट्र को बता रहे थे तो उनको श्रीकृष्ण पर क्रोध आया क्योंकि वो अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित कर रहे थे |

दुविधा में धृतराष्ट्र है , युद्ध नही सका रोक , योगेश्वर समझा रहे , अर्जुन करो ना शोक 

अब वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आगे समझाते हुए कहा “पार्थ , जैसे फटना  वस्त्र का अंतिम सत्य है वैसे ही म्रत्यु शरीर का अंतिम सत्य है तो फिर सत्य का शोक क्यों , मनुष्य शरीर और आत्मा ,नश्वर या अनश्वर का मिश्रण नही है , शरीर तो आत्मा का केवल एक साधन है इसलिए शरीर की चिंता में पड़े बिना ही अपने धर्म का पालन करते रहो,  किन्तु यदि तुम अपने क्षत्रिय धर्म के विषय में सोच रहे हो ,तब भी तुम्हे युद्ध भी करना चाहिए , क्योंकि अधर्म के विरुद्ध अस्त्र-शस्त्र उठाना ही एक क्षत्रिय का धर्म है और आज अधर्म , धर्म के विरुद्ध शस्त्र उठाये सामने खड़ा है , इसलिए अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करो और यदि इस निर्णायक  घड़ी में तुमने अपने क्षत्रिय धर्म का पालन नही किया तो तुम्हे ये समाज और आने वाली पीढ़िया कायर कहकर पुँकारेगी , विजय-पराजय, सुख -दुःख और जीवन-मृत्यु के प्रश्नों में पत उलझो और युद्ध करो और अगर इस युद्ध में तुम्हरी विजय हुयी पृथ्वी का राज्य और यश भोगोगे और वीरगति प्राप्त हुयी तब भी यश के साथ साथ स्वर्ग पाओगे इसलिए इन सबको त्यागकर युद्ध करो ”

अब अर्जुन ने वासुदेव से कहा “हे वासुदेव श्रीकृष्ण , मुझे तो अभी भी ये समझ में नही आ रहा कि इस युद्ध से लाभ क्या होगा ”

अब वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रश्न का जवाब दिया “लाभ-हानि ये दोनों सापेक्ष शब्द है , मै जनता हु कि तुम्हे पृथ्वी के भोग या स्वर्ग की कामना नही है लेकिन तुम मोह के बंधन में बंधन में बंध रहे हो इसलिए लाभ-हानि की इस कामना में ना भटको , केवल कर्म करते रहो फल की इच्छा मत करो , निष्काम कर्म करने से ही तुम्हे लक्ष्य प्राप्त होगा ”

अब अर्जुन ने वासुदेव से कहा “फल की इच्छा ही तो कर्म करवाती है और यदि फल से ही ध्यान हट जाये तो कोई कर्म करेगा ही क्यों ”

अब वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन के प्रश्न का जवाब दिया “”कोई कर्म इसलिए करेगा क्योंकि कर्म के बिना तो जीवन संभव ही नही है , कुछ तो करोगे , खुद भोजन करोगे या भूखे को भोजन करवाओगे या नही करवाओगे , युद्ध करोगे या नही करोगे , तुम्हारे पास तो यही विकल्प है कि तुम क्या करो या ना करो , परन्तु परिणाम तुम्हारे वश में नही है , कर्मफल तुम्हारे वश में नही है , तुम्हारे अधिकार की सीमा इस विकल्प पर समाप्त हो जाती है कि तुम युद्ध करोगे या नही करोगे किन्तु युद्ध का परिणाम तुम्हारे हाथ में नही है , यदि तुम विजय चाहो भी तो ये आवश्यक नही कि विजय तुम्हारी ही हो जाये , तुम्हारी पराजय भी हो सकती है किन्तु यदि तुम विजय से मोहित नही होगे तो पराजय से भी नही घबराओगे और यदि तुम विजय और पराजय को छोडकर ये सोचो कि युद्ध करना तुम्हारा कर्तव्य है तो विजय के सुख या पराजय के दुःख का प्रश्न ही नही उठता ,  जो व्यक्ति ना विजय से सुखी हो और पराजय से दुखी वही स्तिथप्रज्ञ है , इसलिए धर्म का पालन करते हुए कर्म करते रहो यही कर्मयोग है , कर्म का परिणाम मनुष्य के वश में नही है और कर्म की कुशलता का ही नाम योग है ”

अब अर्जुन ने वासुदेव से कहा “हे श्रीकृष्ण , आप मुझे ये बताये कि ये योग क्या है ”

अब वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आगे समझाते हुए कहा “पार्थ , योग कर्म का कौशल है , मोह का त्याग कर्म का कौशल है , मोह का त्याग कर अपने कर्म का पालन करना योगकर्म का कौशल है , सफलता-असफलता दोनों ही में समान रहना कर्म का कौशल है ”

अब अर्जुन ने वासुदेव से कहा “हे केशव ,  लेकिन मै मुनि या स्तिथप्रज्ञ को पहचानूँगा कैसे , उसकी पहचान क्या है , वो उठता बैठता कैसे है उसके वोलने की शैली कैसी है ”

अब वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आगे समझाते हुए कहा “उसे समझने में तो कोई कठिनाई ही नही है , यदि तुम सुख दुःख से परे होकर अपने में संतुस्थ हो जाओ तो ना तुम्हे दुःख की अग्नि जला सकेगी और ना सुख की बर्षा तुम्हे भिगो सकेगी , स्तिथप्रज्ञ वो मुनि है जो सुख और दुःख दोनों में ही समान भाव रखता है और इसका ये संतुलन तोड़ नही सकता है , जब उसके शब्द बाहर निकलते है तो उसके मन में तैरते सुख और दुख से बाहर नही निकलते बल्कि आत्मा की अताह गहराइयों से बाहर निकलते है , वो मोह की भाषा नही बोलता है निष्काम कर्म की भाषा बोलता है , वो जब बैठता है तो कछुए की भांति अपने शरीर को अंदर सिमट कर बैठता है और स्वयं को ही दुर्ग बना लेता है अर्थार्थ उसकी इन्द्रिया उसके वश में होती है और अपनी इन्द्रियों को केवल वही वश में कर सकता है जिसका अपना मन वश में हो ”

अब वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आगे समझाते हुए कहा “हे पार्थ , सामान्य पुरुष विषय का ध्यान करता है और विषय का ध्यान उसे आसक्त बना देता है इस आसक्ति या लगाव से काम का जन्म होता है जब काम की पूर्ति नही होती है तो क्रोध उत्प्प्न होता है जब क्रोध उत्प्प्न होता है तो विषय के प्रति मोह ओर अधिक बढ़ जाता है और मोह जब ओर बढ़ जाता है तो सोचने की शक्ति भटक जाती है , जब सोचने की शक्ति भटक जाती है तो बुद्धि का नाश होता है और जब बुद्धि का नाश होता है तो मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है  इसलिए हे पार्थ , तुम्हारा ये मोह तुम्हे बुद्धि के विनाश की ओर ले जा रहा है और जिसके पास बुद्धि नही होगी, उसे शांति कैसे मिल सकती है क्योंकि वो तो शांति और अशांति में अंतर ही नही कर सकता है और जो शांति को अशांति को अलग नही कर सकता है वो कैसे सुखी रह सकता है ”

अब वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आगे समझाते हुए कहा “हे पार्थ जैसे पवन के झोंके नाव को भटका देते है वैसे ही कामनाये बुद्धि को भटका देती है इसलिए अपनी इन्द्रियों को अपने वश में रखो , स्वयं ही उनके वश में मत हो जाओ , जब संसार सोता है तब मुनि जागता है और जब सन्सर जागता है तब मुनि सोता है

अब अर्जुन ने वासुदेव से कहा “हे केशव ये सोना जागना कैसे है और ये रात दिन कैसे बनते है ”

अब वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आगे समझाते हुए कहा “हे पार्थ मेने रात और दिन की बात तो की ही नही , मैंने तो सोने और जागने की बात कही , सामान्य मनुष्य की जाग सदैव कुछ पाने ओर भोगने में व्यतीत होती है ,यही उसकी चेतना का लक्ष्य है , यदि उसे भूख लगी तो भोजन चाहिए , यदि उसे प्यास लगी तो उसे जल चाहिए ,  यदि उसे ऋतुओ से बचाव करना है तो घर चाहिए ,  उसकी सोच आत्मनिष्ट है परन्तु मुनि की सोच वस्तुनिष्ट है , वो व्यक्तिगत भूख और व्यक्तिगत तृष्णा के परे देखता है , वो वृक्ष से गिरे हुए फल के बारे में नही सोचता , वो तो केवल वृक्ष के विषय में सोचता है , वनों के विषय में सोचता है , सामान्य मनुष्य को इंधन के लिएय लकड़ी चाहिए तो वो वृक्षों को तब तक काटता चला जाएगा जब तक वन नष्ट ना हो जाए परन्तु मुनि पृकृति के महत्व के विषय में सोचता है प्रुकती के संतुलन के विषय में सोचता है , वनों और ऋतुओ के विषय में सोचता है इसलिए सामन्य पुरुष की इन्द्रियों के लिए जो दिन है वो मुनि के लिए रात है क्योंकि वो तो इन्द्रियों की सीमा को पार कर चूका है और जो सामान्य पुरुष की इन्द्रियों के लिए रात है वो मुनि के लिए दिन है क्योंकि उसी सन्नाटे में मुनि की चेतना का सूर्योदय होता है मुनि की रूचि समसयाओ के साथ समस्याओ के समाधान पर भी है और यही उसे सामान्य पुरुष से अलग करती है ”

अब वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आगे समझाते हुए कहा “हे पार्थ , सत्य इन्द्रियों की पंहुच के बाहर है , ऐसा नही है कि मुनि को भूख नही लगती लेकिन वो अपनी भूख के परे देखता है और ये देखता है कि भूख का उपचार क्या है , इसलिए सामान्य मनुष्य का दिन मुनि के लिए रात है और सी सामन्य मनुष्य की इस रात से बचा ले वही स्तिथप्रज्ञ है , सामान्य मनुष्य तो नदियों की भांति है जिन्हें व्याकुलता बहा ले जाती है परन्तु उन्हें अपने मार्ग का ज्ञान नही होता है वो तो अंधाधुंध बही जाती है क्योंकि वो बहने को ही अपना कर्म समझती है इसलिए वो अपना सारा जल सागर में उड़ेल देती है किन्तु सागर फिर भी अपने तटो की मर्यादा का उल्लंघन नही करता इसी प्रकार कामनाओ की नदिया सामान्य मनुष्य को तो बहा ले जाती है परन्तु जब वो मुनि तक आती है तो मुनि उन्हें समेट लेता है और अपनी मर्यादा का उल्लंघन नही करता है इसलिए हे पार्थ तुम भी सागर बनो , सागर मुनि है , सागर ज्ञानी है , तुम भी ज्ञानी बनो पार्थ क्योंकि ज्ञान ही उत्तम है

अब अर्जुन ने वासुदेव से कहा ” हे वासुदेव यदि ज्ञान कर्म से उत्तम है तो आप मुझे इस लहूलुहान कर्म में क्यों लगा रहे है और मै युद्ध क्यों करू , क्यों ना मुनि बनकर मौन समाधि में चला जाऊ , मै  आपसे कल्याण का मार्ग पूछ रहा हु ”

अब वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आगे समझाते हुए कहा”हे अर्जुन , संसार में तो तरह के लोग होते है अन्तर्मुखी और बहिर्मुखी , जो अन्तर्मुखी होते है वो स्वयं के भीतर इश्वर को देखते है यही ज्ञानयोग है और जो बहिर्मुखी होते है वो स्वय से बाहर निकलकर उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते है किन्तु कर्म से छुटकारा नही मिलता है , भीतर जाकर खोजना भी कर्म ही तो है , इसलिए मार्ग तो दो ही है पहला ज्ञानयोग और दूसरा कर्मयोग  ”

अब अर्जुन ने वासुदेव से कहा ” हे वासुदेव तो फिर मै ज्ञानयोग के मार्ग पर ही क्यों ना चलू ”

अब वासुदेव श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आगे समझाते हुए कहा” हे पार्थ , ज्ञानयोग भी कर्म को त्यागने का मार्ग नही है , सिद्धि का मार्ग नही है क्योंकि कर्म के बिना तो जीवन सम्भव ही नही है , आँखे है तो वो अवश्य देखेगी , पलके है तो वो अवश्य झपकेगी , कान है तो वो अवश्य सुनेगे , जो कर्मेन्द्रियो की आड़े आये या उन्हें बलपूर्वक रोककर उनका दमन करके विषयों का चिन्तन करे वो योगी नही,  वो ज्ञानी नही , वो तो मिथ्याचारी है , सिद्ध पुरुष इन्द्रियों को अपने वश में करता है उनका दमन नही करता अर्थार्थ वो आँखे बंद करके नही जीता , कर्म बिना तो शरीर की यात्रा संभव ही नही , व्यक्ति सांस तो लेगा ही , यदि वातावरण में कोई सुगंध या दुर्गन्ध है तो वो उसका अनुभव करने के लिए भी विवश है , यदि उसके आस पास कोई ध्वनी है तो उसे सुनने के लिए उसके कर्ण उसके आदेश की प्रतीक्षा नही करेंगे , इसलिए जो व्यक्ति अपने इन्द्रियों को नियंत्रित रखे , जो उन पर पर अपनी चेतना का अंकुश लगाकर उन्हें कर्म की दिशा दिखाए व्ही श्रेष्ट है वो अपने विकल्पों को समझता है और अपनी संकल्पशक्ति का प्रयोग करता है इसलिए अपने नियत कर्म करना कुछ ना करने से अच्छा है “

loading...
Loading...

2 Comments

Leave a Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *